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Thursday, March 27, 2025

मंत्री जी 8 साल बेमिसाल के कार्यक्रम में व्यस्त, वही चिरईगांव ब्लॉक के एडीओ एसटी नींद लेने में मस्त

वाराणसी: विकास खण्ड चिरईगांव में राज्य सरकार के 8 साल बेमिसाल के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर आए हुए थे और विभागों के द्वारा लगाए गए स्टालों पर जा कर उनसे जानकारी ले रहे थे और कर्मचारियों से बात करके जानकारी ले रहे थे उनके साथ खंड विकास अधिकारी बी एन द्विवेदी भी मौजूद थे।


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तो वही दूसरी ओर विकास खण्ड के जिम्मेदार अधिकारी एडीओ एसटी अपनी नींद पूरी कर रहे थे। इतना ही नहीं उनको जब की मालूम था कि आज कैबिनेट मंत्री का कार्यक्रम उनके विकास खण्ड में होना है फिर भी उनको अपनी जिम्मेदारी का रत्तीभर भी एहसास नहीं था।

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अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि राज्य सरकार अपने 8 साल बेमिसाल को लेकर के जनता के बीच जा रही है और सरकार के द्वारा किए गए कार्यों को जनता के सामने रख रही है और सेवा सुरक्षा और सुशासन का दावा कर रही है। क्या यही सुशासन है कि एक मंत्री विकास खंड पर आता है और जनता के सामने अपने सरकार के द्वारा किए गए कार्यों के बारे में बताता है तो वहीं दूसरी तरफ एक जिम्मेदार अधिकारी का इस तरह से सोना यह कौन सा सुशासन है?

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Wednesday, March 26, 2025

जनपक्षधर पत्रकारिता और डिजिटल सेंसरशिप

प्रोफेसर राहुल सिंह अध्यक्ष  उत्तर प्रदेश वाणिज्य परिषद की कलम से

पत्रकारिता को दिन-ब-दिन मुश्किल बनाया जा रहा है। अख़बारों और टीवी चैनलों की धूर्तता अब किसी से छिपी नहीं है, लेकिन AI टूल्स, गूगल, फेसबुक, यूट्यूब और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स भी आपकी आवाज़ को अपने तरीक़े से दबाने का काम कर रहे हैं। यह सेंसरशिप इतनी बारीक और पेचीदा होती है कि अक्सर हमें इसका एहसास तक नहीं होता। मैंने यूट्यूब पर काम कर रहे कुछ सफल और कुछ असफल लोगों के कंटेंट का जायज़ा लिया। इसमें मैंने पाया कि सोशल मीडिया आपको कुछ ख़ास मुद्दों पर और एक ख़ास ढंग से काम करने के लिए प्रेरित करता है। अगर आप इन संकेतों को नज़रअंदाज़ कर जनपक्षधर पत्रकारिता करने की कोशिश करते हैं, तो आपको अलग-अलग तरीक़ों से रोका जाता है।


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सबसे आसान तरीका यह है कि आपकी आवाज़ को उन्हीं लोगों तक सीमित कर दिया जाए, जो पहले से आपकी बातों से सहमत हैं। यह काम इतनी ख़ामोशी से किया जाता है कि आपको अंदाजा भी नहीं होता कि आपकी पहुँच पर रोक लगाई जा चुकी है। दूसरा तरीका आपके अकाउंट को अस्थायी या स्थायी रूप से बंद करना है। हालाँकि, अब यह तरीका कम अपनाया जाता है; इसकी जगह आपकी रीच को कम कर दिया जाता है, जिससे आपके वीडियो या लेख ज़्यादा लोगों तक नहीं पहुँचते। AI टूल्स और गूगल सर्च भी आपकी अभिव्यक्ति को अपने हिसाब से नियंत्रित करते हैं। कई बार जब आप किसी संवेदनशील मुद्दे पर सर्च करते हैं, तो आपको मुख्यधारा की मीडिया से हटकर जानकारी नहीं मिलती। मसलन, अगर आप गूगल पर “भारत में मुसलमान विरोधी सांप्रदायिक हिंसा” खोजते हैं, तो हो सकता है कि आपको वह रिपोर्ट न मिले जो निष्पक्ष दृष्टिकोण से तैयार की गई हो। इसके बजाय, सर्च रिज़ल्ट में मुसलमानों को ही दंगाई के रूप में पेश करने वाली खबरें ज़्यादा दिखाई दें, जबकि हिंदू अतिवादियों की हकीकत को बड़े ही सलीक़े से छिपा दिया जाए।

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इसी तरह, अगर आप OpenAI या अन्य AI चैटबॉट्स से इज़राइल-फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर निष्पक्ष जानकारी माँगते हैं, तो आपको गोलमोल जवाब मिलेंगे। कभी-कभी ये टूल्स आपको पूरी तरह भटका देते हैं, और अगर आपकी सियासी समझ गहरी नहीं है, तो आप इस भटकाव के शिकार भी हो सकते हैं। आज की डिजिटल दुनिया में निष्पक्ष और जनपक्षधर पत्रकारिता के लिए जगह तेज़ी से सिकुड़ती जा रही है। मुख्यधारा की मीडिया कॉर्पोरेट और सत्ता प्रतिष्ठानों के दबाव में काम करती है, जबकि डिजिटल मीडिया भी अपने एल्गोरिदम के ज़रिए यह तय करता है कि कौन-सी जानकारी को ज़्यादा फैलाया जाए और कौन-सी दबा दी जाए। अब सूचना महज़ सूचना नहीं रही, बल्कि एक टूल, एक हथियार बन चुकी है। सूचना का सही इस्तेमाल सत्ता बना और बिगाड़ सकता है, तो इसके ज़रिए किसी समाज में अमन और शांति भी क़ायम की जा सकती है।

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डिजिटल मार्केटिंग आज पूरी तरह आपसे छीनी गई या चोरी की गई सूचनाओं पर निर्भर है। आपके मोबाइल में कम से कम दो दर्जन ऐप होंगे, जिनको आपने अपने कॉन्टैक्ट्स, मीडिया फाइल्स, माइक्रोफोन और कैमरे तक पहुँच की अनुमति दे रखी है। यानी यह छोटा-सा मोबाइल आपकी इतनी ख़ामोशी से जासूसी कर रहा है कि अगर यही काम इंसानों से करवाया जाए, तो एक शख़्स की निगरानी पर लाखों रुपये खर्च होंगे। सोचिए, आपकी उँगलियाँ जो इस वक़्त कीबोर्ड पर चल रही हैं, उनकी हर हरकत दुनिया के कई हिस्सों में रिकॉर्ड हो रही है। आपकी पसंद, नापसंद, विचारधारा और यहाँ तक कि आपकी सियासी सोच भी कहीं न कहीं दर्ज हो रही है। ये डेटा सिर्फ़ विज्ञापन कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि सरकारों और ख़ुफ़िया एजेंसियों के लिए भी बेहद क़ीमती होता है।

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अगर आप समझते हैं कि पत्रकारिता सिर्फ़ सच को सामने लाने का नाम है, तो आप ग़लत हैं। आज पत्रकारिता एक ख़तरनाक पेशा बन चुका है, ख़ासतौर पर अगर आप सत्ता और कॉर्पोरेट के ख़िलाफ़ लिखते हैं। ग़ाज़ा में 120 पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया, क्योंकि वे वह सच दिखा रहे थे जिसे कुछ ताक़तें छिपाना चाहती थीं। हमारे देश में भी पत्रकारों की हत्या अब आम बात हो गई है। सबसे आसान तरीका है कि पत्रकारों पर फ़र्ज़ी मुक़दमे कर दिए जाएँ। भले ही वे बाद में बरी हो जाएँ, लेकिन मुक़दमे की दौड़-धूप में उनकी सामाजिक, आर्थिक और मानसिक हालत इतनी ख़राब हो जाती है कि वह दोबारा उठ भी नहीं पाते। हाल ही में नागपुर में हुई सांप्रदायिक हिंसा पर मेरी एक वीडियो रिपोर्ट पर एक व्यक्ति ने धमकी दी कि अगर मैं इस तरह की रिपोर्टिंग जारी रखता हूँ, तो वह पुलिस में शिकायत करेगा। जबकि उस वीडियो में सिर्फ़ तथ्य पेश किए गए थे और उन्हीं का विश्लेषण किया गया था। सोचिए, ये कौन लोग हैं जो सच सामने लाने वालों को डराने की कोशिश कर रहे हैं?

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ऐसे हालात में स्वतंत्र पत्रकारों और वैकल्पिक मीडिया संस्थानों के लिए चुनौतियाँ और भी बढ़ जाती हैं। सोशल मीडिया पर बने रहना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि जिन मुद्दों को मुख्यधारा की मीडिया नज़रअंदाज़ करती है, उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म भी दबाने की कोशिश करते हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया का अपना महत्व है, लेकिन इन पर पूरी तरह निर्भर रहना बेहद जोखिम भरा हो सकता है। अगर हम निष्पक्ष और जनपक्षधर पत्रकारिता को ज़िंदा रखना चाहते हैं, तो हमें नए विकल्पों की तलाश करनी होगी। स्वतंत्र वेबसाइटें, वैकल्पिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और प्रत्यक्ष संवाद के ज़रिए लोगों तक सही जानकारी पहुँचाने की कोशिश करनी होगी। पत्रकारिता को सिर्फ़ बाज़ार और सत्ता के चश्मे से देखने के बजाय, इसे समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बनाना ही असली चुनौती है। आने वाले वक़्त में हमें डिजिटल निगरानी और सेंसरशिप से निपटने के नए तरीक़े विकसित करने होंगे। अगर हम अपनी निजता और अभिव्यक्ति की आज़ादी को बचाना चाहते हैं, तो हमें इस लड़ाई को सिर्फ़ सोशल मीडिया तक सीमित रखने के बजाय ज़मीन पर भी लड़ना होगा। पत्रकारिता को बचाने के लिए ज़रूरी है कि हम सच के साथ खड़े हों, चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों।

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“जो लिखेंगे सच, वो सताए जाएँगे, जो बोलेंगे हक़, वो दबाए जाएँगे

लेकिन मिटेगा नहीं हौसला सच का, हर दौर में, दीए जलाए जाएँगे।”

बीएचयू में धरनारत छात्र शिवम सोनकर से मिले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, विश्वविद्यालय प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप

वाराणसी: उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय सोमवार देर रात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) पहुंचे, जहां उन्होंने धरने पर बैठे छात्र शिवम सोनकर से मुलाकात की। शिवम पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में हो रहे अन्याय के खिलाफ संघर्षरत हैं।


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अजय राय ने विश्वविद्यालय प्रशासन और केंद्र सरकार पर दलित छात्रों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि शिवम सोनकर ने अब तक आठ बार नेट क्वालीफाई किया है और उनके विभाग में आरईटी एक्सेम्प्टेड श्रेणी में तीन सीटें खाली होने के बावजूद सिर्फ दो सीटें उपलब्ध कराई गई हैं। यह स्थिति सामाजिक न्याय के खिलाफ है और दलित छात्रों के अधिकारों का हनन है।

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कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा, "बीएचयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में जातिगत भेदभाव भाजपा सरकार की नीतियों को उजागर करता है। महामना की बगिया को बचाने के लिए कांग्रेस पूरी ताकत से लड़ेगी। शिवम सोनकर को उनका हक दिलाकर रहेंगे।" उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने और छात्र के पीएचडी प्रवेश की गारंटी देने की मांग की। राय ने कहा कि यह केवल एक छात्र की लड़ाई नहीं है बल्कि पूरे समाज के शिक्षा के अधिकार की लड़ाई है।

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कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि यदि जल्द से जल्द न्याय नहीं मिला तो वे इस मुद्दे को बड़े आंदोलन में बदलने से पीछे नहीं हटेंगे। इस दौरान कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे। इसमें जिलाध्यक्ष राजेश्वर पटेल, महानगर अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे, युवा कांग्रेस के पूर्व प्रदेश सचिव चंचल शर्मा, पंकज सोनकर, परवेज खान, विश्वनाथ कुंवर और अन्य शामिल रहे।

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टीबी हारेगा, देश जीतेगा- आओ मिलकर टीबी मुक्त भारत बनायें – सीएमओ

वाराणसी: राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता का कार्यक्रम हैI माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आवाहन पर 2025 तक टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य रखा गया है| इस क्रम में बुधवार को मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय सभागार में पीडियाट्रिक टीबी की पहचान हेतु जनपद स्तरीय टीओटी का आयोजन किया गया| कार्यक्रम का उद्देश्य, बच्चों में टीबी की समय पर पहचान, जांच, निदान एवं उपचार को मजबूत करना है जिससे अधिक से अधिक बच्चों को क्षय रोग से बचाया जा सके| राज्य स्तर से आये ट्रेनर शैलेंद्र उपाध्याय द्वारा प्रशिक्षण प्रदान किया गया| इस प्रशिक्षण का आयोजन राज्य स्तर से नामित वर्ल्ड हेल्थ पार्टनर संस्था द्वारा किया गया| हम सब मिलकर टीबी मुक्त भारत का निर्माण कर सकते हैं| इसकी जानकारी मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ संदीप चौधरी ने दी।


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सीएमओ ने बताया कि पिछले 6 महीने में 630 बच्चे खोजे गये, जिसमें 147 बच्चे उपचार के उपरांत स्वस्थ हो गये हैं, वह अपना जीवन सामान्य रूप से व्यतीत कर रहे हैं उनका परिवार भी खुश है| इसके अलावा 483 बच्चों का इलाज चल रहा है| उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों में टीबी का समय से पता लगाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। बच्चों में टीबी रोकने तथा समय से पहचान कर इलाज शुरू करने हेतु जिले में एक दिवसीय ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स का आयोजन किया गयाI किया। उन्होंने बताया कि टीबी का इलाज संभव है, सही समय पर इसका उपचार करवाया जाये और समय से दवाइयों का सेवन किया जाये तो क्षय रोगी आसानी से स्वस्थ हो सकते हैं।

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जिला क्षय रोग अधिकारी एवं कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ पीयूष राय ने बताया कि प्रशिक्षण में बच्चों में टीबी की पहचान, जांच, निदान एवं उपचार पर विस्तार से जानकारी दी गई| उन्होंने बताया कि अभी कुछ बच्चे टीबी जांच और उपचार से वंचित रह जाते हैं इसका प्रमुख कारण समसामयिक रेफरल की कमी, जागरूकता का अभाव एवं प्रारंभिक लक्षणों की अनदेखी है। उन्होंने यह भी बताया कि समय पर रेफरल प्रणाली को मजबूत करने से इन बच्चों को उचित उपचार मिल सकता है। जिसके लिए यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है और जनपद स्तरीय चिकित्सालय में यह कार्क्रम आयोजित किया जा चुका है।

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इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का संचालन डीपीसी अनीता सिंह द्वारा किया गया। प्रशिक्षण में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉक्टर संजय राय, ब्लॉक स्तरीय राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के मेडिकल ऑफिसर, एकीकृत बाल विकास सेवा विभाग से सीडीपीओ, आंगनबाड़ी सुपरवाइजर एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के डॉ संतोष कुमार सिंह तथा जिला कार्यक्रम अधिकारी व मैनेजर उपस्थित रहेI।

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सफलता की कहानी, जयश्री प्रसाद की जुबानी

वाराणसी: आयुष्मान भारत योजना (प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना) के तहत, कई गरीब और कमजोर परिवारों को मुफ्त और कैशलेस इलाज मिल रहा है, जिससे उनकी जान बच रही है और वे बेहतर जीवन जी पा रहे हैं। आयुष्मान भारत कार्ड योजना के तहत स्वास्थ्य विभाग बुजुर्गों की बेहतर स्वास्थ्य सेवा के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। इसकी जानकारी मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ संदीप चौधरी ने दी।


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सीएमओ ने बताया कि पहाडपुर, वाराणसी निवासी 73 वर्षीय जयश्री प्रसाद ने सूर्योदय अस्पताल में उन्नत उपचार के लिए ओपीडी में दिखाया, जहाँ उन्हें आयुष्मान भारत योजना के रूप में बहुत सहायता मिली। इस योजना के तहत एक पात्र लाभार्थी होने के नाते, उन्होंने वहाँ अपना इलाज करवाया।  जयश्री अब पूरी तरह से ठीक हो गये हैं और अपने परिवार में आ गये हैं। योजना का लाभ उनके लिए एक बड़ा वरदान साबित हुआ, जिसके माध्यम से वह खुद को और अपने बच्चों के भविष्य को बचाने में सक्षम हुये। आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज पाकर जयश्री प्रसाद स्वस्थ हुये और परिवार भी खुश हुआ।

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आयुष्मान भारत योजना के नोडल अधिकारी डॉ एस एस कनौजिया ने बताया कि जयश्री प्रसाद  पिछले कुछ वर्षों से हृदय रोग से पीड़ित थे, जिसके कारण उन्हें स्वस्थ रहने के लिए उनके हृदय की जाँच की तुरंत आवश्यकता थी। 73 वर्षीय जयश्री प्रसाद 29 नवम्बर 2024 को सूर्योदय हॉस्पिटल, भोजूवीर में डाक्टर को ओपीडी में दिखाया था,  डाक्टर ने जयश्री प्रसाद को देखने के बाद आईसीयू में भर्ती करने का निर्णय लिया और उपचार शुरू किया। मरीज को एक सप्ताह से बुखार आ रहा था, खांसी के साथ-साथ बलगम,  हाई ग्रेड पैरेक्सिया और पेशाब करने में दिक्कत होती थी, बीपी बढ़ जाता था, साँस लेने में दिक्कत होती थी, दिल कि धड़कन बढ़ जाती थी, इलाज शुरू करने के एक हप्ते के बाद मरीज में काफी सुधार आया। यह मरीज 8 दिसम्बर को डिस्चार्ज हो गया|  जयश्री प्रसाद का इलाज आयुष्मान कार्ड से 96000 में किया गया।

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“जयश्री प्रसाद ने बताया कि मेरे दिल की बीमारी के कारण इस दर्द और पीड़ा के साथ, हर दिन मुझे एक साल जैसा लगता था। मैं अपने बच्चों के भविष्य के बारे में चिंतित था और सोच रहा था कि अगर मैं जीवित नहीं रहा तो उनका क्या होगा। सरकार की यह योजना हमारे जैसे लोगों के लिए एक बड़ा सहारा है और मैं बस यही चाहता हूँ कि अधिक से अधिक लोग अपने परिवार के स्वास्थ्य और धन को बचाने के लिए इस योजना का लाभ उठायें।" 

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प्रगति के परिजन ने की फांसी की सजा की मांग.. दोनों की रजामंदी से हुई थी शादी

लखनऊ: UP के औरैया जिले में हाइड्रा मालिक दिलीप हत्याकांड के पीछे उसकी पत्नी प्रगति का हाथ निकलने पर लोग दंग रह गए हैं। मायके के परिजनों ने कहा कि नालायक बेटी के मंसूबों की भनक लग जाती, तो वह कभी उसकी शादी दिलीप से नहीं करवाते। दिलीप के हत्यारों को फांसी की सजा दी जाए।



प्रगति परिवार के लिए मर चुकी है...
भाई आलोक ने कहा कि प्रगति का दिलीप से बिना मर्जी शादी करवाने का आरोप मनगढ़ंत है। उसकी इस घिनौनी हरकत से वह परिवार के लिए मर चुकी है। दिलीप बहन पारुल का देवर था। वह बहुत ही सरल स्वभाव का व्यक्ति था।


दोनों की रजामंदी से हुई थी शादी..
प्रगति भी उससे काफी घुली मिली थी। शादी दोनों की रजामंदी से हुई थी। उसे या परिजन को जरा सी भी भनक लग जाती, तो वह उसकी शादी कभी भी दिलीप से नहीं करवाते। उनकी न्यायपालिका से मांग है कि दिलीप हत्याकांड में शामिल उनकी बहन प्रगति सहित सभी हत्यारोपियों को फांसी की सजा दी जाए।

मुख्यमंत्री बाल आशीर्वाद योजना, जरूरतमंद बच्चों के लिए सहायता

लखनऊ: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना के तहत उन बच्चों को आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है, जिनके माता-पिता दोनों या किसी एक की मृत्यु 01 मार्च 2020 के बाद हो गई है और उनकी उम्र 18 वर्ष से कम है।

इस योजना के अंतर्गत प्रत्येक पात्र बच्चे को ₹4000 प्रति माह सहायता राशि दी जाएगी। और एक परिवार में अधिकतम दो बच्चों को यह लाभ मिलेगा। आवेदन करने के लिए आपको फॉर्म भरकर कार्यालय जिला बाल संरक्षण इकाई या जिला प्रोबेशन अधिकारी कार्यालय में जमा करना होगा। यह आवेदन फॉर्म आपको ब्लॉक, तहसील और जिला कलेक्टर ऑफिस से मिल जायेगा।

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इसके लिए आवश्यक दस्तावेजों में बच्चा एवं माता का संयुक्त बैंक खाता, राशन कार्ड, आधार कार्ड (मां एवं बच्चे का), स्कूल ID कार्ड या प्रधानाचार्य का प्रमाण पत्र, पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र की कॉपी लगनी होगी

हम अपने पूर्वांचल खबर कि टीम कि तरफ से सभी नागरिकों से अनुरोध है कि इस योजना की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं, ताकि जरूरतमंद बच्चों को इसका लाभ मिल सके। साथ ही विद्यालय प्रशासन से भी अपील की जाती है कि वे सभी छात्र-छात्राओं को इस योजना की सूचना दें।

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